प्रेम संसार का सबसे पवित्र बंधन है।
पर सच बताए तो यह बंधन से मुक्त है, स्वतंत्र है।
एक व्यक्ति किसी वस्तु या तत्व या लक्ष्य से प्रेम कर सकता है जिसको वह सम्मान करता है। यह सिर्फ एक दूसरे के लिए चाह नहीं बल्कि एक शक्तिशाली भाव है।
प्रेम बिना किसी शर्त के किया जाता है। प्रेम प्राप्त करने वाले को वो जैसा भी हो स्वीकार करना सिखाता है। भले ही उसमें कितने ही खामियां,कमियां या दोष क्यों न हो। इस प्रकार के प्रेम में सामने वाला बलिदान देता चला जाता है बिना बदले में किसी चीज के उम्मीद के।
भारतीय परंपरा करती है कि जब हम किसी से प्रेम करते हैं तो उनके प्रति पूरी तरह से हम अपने आप को समर्पित कर देते हैं। संपूर्ण समर्पण प्रेम की प्राथमिक मांग है। हम ईश्वर या भौतिक प्रेम के प्रति आत्मसमर्पण कर देते हैं तो इसका मतलब होता है कि हम उसके दासता को स्वीकार कर रहे है अर्थात गुलाम बन रहे है यानि कि वह जैसा चाहा रहा है या कह रहा है हम वैसा ही कर रहे है क्योंकि हम भी वैसा ही चाह रहे हैं और हमारा जो समर्पण है, वह पूरी तरह से आत्म समर्पण है लेकिन लेकिन मारिया कहती है,"यह सच नहीं है। स्वतंत्रता का अस्तित्व तभी है जब प्यार की उपस्थिति हो।" अगर प्यार नहीं है तो सीधी सी बात है कि गुलामी भी नहीं है।
जबकि जो व्यक्ति प्रेम के पवित्र बंधन में बंध कर खुद को समर्पित कर देता है वही व्यक्ति संपूर्ण स्वतंत्रता का अनुभव कर सकता है उसके ऊपर भी स्वतंत्र प्रेम को उढ़ेलता है अर्थात स्वतंत्रता का एहसास कराता है मतलब उसको किसी भी चीज के लिए बाध्य नहीं करता बल्कि सब कुछ उसके स्वेच्छा पर छोड़ देता है ।
जिसमे इतनी पवित्रता होती है कि एक दूसरे को सबसे पवित्र बंधन प्रेम में बांध कर रखती है। आपने देखा कि कैसे गुलामी में स्वतंत्रता या स्वतंत्रता में गुलामी हुई इसीलिए कहते हैं प्रेम संसार का सबसे पवित्र बंधन है। पर सच बताए तो यह बंधन से मुक्त है, स्वतंत्र है।







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