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“भारत की प्रेरणादायक महिलाएँ: नारी सशक्तिकरण की सच्ची पहचान”

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2026 (8 मार्च) की मुख्य थीम 'Give To Gain' (पाने के लिए योगदान दें/दान करें) है, जो महिलाओं और लड़कियों के सशक्तिकरण के लिए सहयोग, समर्थन और संसाधनों को साझा करने पर जोर देती है। यह थीम आपसी सहयोग से लैंगिक समानता को बढ़ावा देने और महिलाओं के लिए बेहतर अवसर पैदा करने का संदेश देती है।            "अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस सीमा सुरक्षा बल की महिला कर्मी केवल सीमाओं की प्रहरी नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की सक्रिय सहभागी हैं। उनका योगदान सुरक्षा, सेवा और समर्पण की त्रिवेणी है, जो बल की कार्य संस्कृति और प्रतिबद्धता को और सशक्त बनाता है।"            यदि आप एक पुरुष को शिक्षित करते हैं तो केवल एक व्यक्ति शिक्षित होता है, लेकिन यदि आप एक महिला को शिक्षित करते हैं तो पूरा परिवार शिक्षित होता है।” — Brigham Young   अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस कब से और क्यों मनाया जाने लगा? 1. कब से मनाया जाने लगा? अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की शुरुआत 1908 में हुई जब अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में लगभग 15,000 महिलाओं ने बेहतर...
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होली से पहले सरसों का उबटन

  होली से पहले सरसों का उबटन : पूर्वांचल की मिट्टी से जुड़ी एक स्नेहभरी परंपरा पूर्वांचल की होली केवल अबीर-गुलाल और रंगों की मस्ती तक सीमित नहीं रही है। यहाँ होली आने से पहले ही घरों में एक अलग-सी तैयारी शुरू हो जाती थी – सरसों का उबटन बनाने की तैयारी। जैसे ही फागुन की हवा चलती और खेतों में पीली सरसों लहराती, वैसे ही घरों में दादी-नानी की आवाज सुनाई देती – "होली आने वाली है, पहले सरसों का उबटन लगा लो, फिर रंग खेलना।" यह परंपरा पूर्वांचल के गाँवों में आज भी कहीं-कहीं जीवित है। होली से एक-दो दिन पहले या होली की सुबह ही घर की महिलाएँ सरसों के तेल में बेसन, हल्दी या आटा मिलाकर उबटन तैयार करती थीं। फिर बच्चों से लेकर बड़ों तक सबको बैठाकर प्यार से यह उबटन लगाया जाता था। यह केवल शरीर पर लगाया जाने वाला लेप नहीं था, बल्कि परिवार के स्नेह और देखभाल का प्रतीक था। सरसों के उबटन की सुगंध में बसता था फागुन जब सरसों का उबटन शरीर पर लगाया जाता था तो उसकी हल्की-सी खुशबू पूरे आँगन में फैल जाती थी। मिट्टी का आँगन, धूप की नरमी और सरसों के उबटन की महक – यही पूर्वांचल की होली की असली पहचान...

"सौदाला का जातिमुक्त सपना : घोषणा से आगे सोच का बदलाव"

  सौदाला का जातिमुक्त सपना और हमारी सामाजिक सच्चाई ” हाल ही में महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव सौदाला को जातिमुक्त गांव घोषित किया गया। यह खबर सुनकर मन में आशा भी जगी और एक गहरी सोच भी पैदा हुई। लगा कि शायद भारत का गांव सच में बदल रहा है — वह गांव, जहाँ कभी पहचान नाम से पहले जाति से होती थी, अब बराबरी की बात कर रहा है।       सौदाला का यह कदम केवल एक घोषणा नहीं, बल्कि एक सपना है — ऐसा समाज जहाँ इंसान की पहचान उसकी मेहनत और उसके चरित्र से हो, न कि उसकी जाति से। यह विचार बहुत सुंदर है, और शायद हर संवेदनशील व्यक्ति का सपना भी। लेकिन जब मैं अपने आसपास के समाज को देखती हूँ, खासकर उत्तर भारत और कुछ पिछड़े इलाकों को, तो महसूस होता है कि जातिवाद अभी भी हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बना हुआ है। गांवों में आज भी रिश्ते जाति देखकर तय होते हैं, कई जगह साथ बैठकर खाना भी सहज नहीं है, और पहचान पूछते समय अक्सर पहला सवाल यही होता है — “कौन सी जाति?” ऐसे में मन कहता है कि सौदाला का कदम सही है, लेकिन हर जगह तुरंत लागू कर देना शायद आसान नहीं होगा। समाज की सोच बदलना किसी सरकारी आदेश य...

Chhat puja akhir kyo mnaya jata hai

छठ पूजा क्यों मनाया जाता है? छठ पूजा भारत का एक अत्यंत प्राचीन और पवित्र त्योहार है। यह मुख्य रूप से सूर्य देव और छठी मैया (ऊषा/प्रातःकालीन सूर्य की शक्ति) की उपासना के रूप में मनाया जाता है। आइए सरल भाषा में समझते हैं कि छठ पूजा क्यों मनाई जाती है — 1. सूर्य देव के आशीर्वाद के लिए सूर्य देव को ऊर्जा, स्वास्थ्य और जीवन का स्रोत माना गया है। क्योंकि सूर्य के बिना जीवन संभव नहीं है, इसलिए छठ में सूर्य को धन्यवाद दिया जाता है कि उन्होंने हमें प्रकाश, भोजन और जीवन दिया। 2. छठी मैया से परिवार की सुख-समृद्धि की कामना छठी मैया, जिन्हें माता प्रकृति और संतान के स्वास्थ्य की देवी माना जाता है, उनसे  संतान की सुरक्षा  घर में सुख-शांति  और परिवार की उन्नति  की प्रार्थना की जाती है। 3. पति और परिवार की लंबी आयु के लिए इस व्रत को विशेष रूप से महिलाएँ करती हैं। वे पति की लंबी आयु, परिवार के स्वास्थ्य और खुशहाली के लिए यह कठिन व्रत रखती हैं। 4. पवित्रता, संयम और आत्म-नियंत्रण का पर्व छठ पूजा में बिना नमक का भोजन (कढ़ी प्रसाद) बिना प्याज-लहसुन का भोजन शुद्धता और सफ़...

Snakes

  भारत में साँपों की बहुत सी प्रजातियाँ पाई जाती हैं, लेकिन उनमें से केवल कुछ ही विषैले (Poisonous) होते हैं। नीचे मुख्यतः पाए जाने वाले साँपों के प्रकार, उनकी पहचान और ज़हर की जानकारी दी गई है ताकि आप विषैले और गैर-विषैले साँपों में फर्क कर सकें। 🐍 साँपों के मुख्य प्रकार (भारत में) 1. कोबरा (Cobra) – विषैला पहचान: गर्दन पर फन फैलाता है। फन के पीछे "ग्लास के आकार" का चिह्न होता है (❖ या ⚫ के जैसा)। आँखें बड़ी और गोल। ज़हर: न्यूरोटॉक्सिक (मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र पर असर डालता है) लक्षण: साँस लेने में कठिनाई, धुंधला दिखना, पलकें झपकाना बंद होना। 2. क्रेट (Common Krait) – अत्यंत विषैला पहचान: चमकदार काला शरीर, पतला और लंबा। सफेद पतली धारियाँ होती हैं। रात में ज्यादा सक्रिय होता है। ज़हर: न्यूरोटॉक्सिक लक्षण: नींद जैसा एहसास, शरीर सुन्न होना, बोलने में कठिनाई। 3. रसेल वाइपर (Russell’s Viper) – अत्यंत विषैला पहचान: शरीर मोटा और भारी। पूरी पीठ पर “O” जैसे गोल चिह्न। फुफकारने की तेज़ आवाज करता है। ज़हर: हेमोटॉक्सिक (खून पर असर डालता है) लक्षण: खून बहना बंद नहीं होता, शरीर में सूज...

Essay on Mahakumbh Mela

  मानवता की अमूल्य धरोहर है कुंभ  तीर्थयात्रियों, कल्पवासियों एवं स्नानार्थियों का संगम है कुंभ यह आस्था का सैलाब व  चुम्बकीय शक्ति है जो,  विश्व को अपनी ओर खिंचती है। कुंभ को भारतीय संस्कृति का महापर्व और विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक मेला माना जाता है। जहाँ कोई आमंत्रण अपेक्षित नहीं होता है। फिर भी करोड़ो यात्री देश-विदेश से इस पर्व को मनाने के लिए इस पावन संगम पर एकत्र होते है।           वैश्विक पटल पर शांति और सामंजस्य का प्रतीक मानते हुए वर्ष 2017 में यूनेस्को ने कुम्भ मेले को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में मान्यता प्रदान की है।            कुंभ की गहराई में उतरने के लिए हमें यह समझना होगा कि -   दिल लगाना हो तो बनारस जाइएगा।  और सुकून पाना हो तो महाकुंभ आइएगा ॥            तो आइए मिलकर लगाते हैं कुम्भ रूपी मेले में डुबकी जहाँ आस्था, आध्यात्म और कहानियों में विलीन होकर सुकून का अनुभव प्राप्त करते हैं। तुम ताजमहल के आगे सेल्फी लेती  मैं प्रयागर...

डॉ. भीमराव अंबेडकर केवल जाति सुधारक थे या समाज सुधारक भी?

  कोई भी व्यक्ति अपने आसपास के वातावरण में होने वाली गतिविधियों से सीखता है तथा जीवन के अनुभव को ग्रहण करता है और उन्ही अनुभव को कायदे कानून मानते हुए जीवन के रास्ते में ऊंचाइयों तक बढ़ता है। ऊंचाइयों तक पहुंचने वाले व्यक्ति महान व्यक्तित्व के रूप में उभरकर सामने आते हैं। उन्हीं महान व्यक्तित्व में से एक शानदार व्यक्ति है डॉक्टर भीमराव बाबासाहेब रामजी आंबेडकर  परंतु    वर्तमान में इन्हें जाति विशेष का नेता मान लिया गया जबकि उससे कहीं ज्यादा उन्होंने  भारतीय महिलाओं की स्थिति सुधारने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई क्योंकि जातिवाद से कहीं ज्यादा महिलाओं की स्थिति दयनीय थी।   जबकि दूसरे नंबर पर जातिवाद की समस्याए है।आज भी अधिकतर महिलाएं अपने अधिकारों को नहीं जानती है इसलिए अंबेडकर जी के महत्वाकांक्षा को समझने में असमर्थ है। उन्होंने केवल जाति विशेष को दर्जा नहीं दिलाया बल्कि समाज के उन सभी वंचित वर्गों को अधिकार दिलाया जो उसके हकदार थे परंतु जिस  हर्षोल्लास के साथ अंबेडकर जयंती निम्न जाति के लोगों द्वारा मनाया जाता है उतनी जश्न के साथ  उच्च जाति तथ...