होली से पहले सरसों का उबटन : पूर्वांचल की मिट्टी से जुड़ी एक स्नेहभरी परंपरा पूर्वांचल की होली केवल अबीर-गुलाल और रंगों की मस्ती तक सीमित नहीं रही है। यहाँ होली आने से पहले ही घरों में एक अलग-सी तैयारी शुरू हो जाती थी – सरसों का उबटन बनाने की तैयारी। जैसे ही फागुन की हवा चलती और खेतों में पीली सरसों लहराती, वैसे ही घरों में दादी-नानी की आवाज सुनाई देती – "होली आने वाली है, पहले सरसों का उबटन लगा लो, फिर रंग खेलना।" यह परंपरा पूर्वांचल के गाँवों में आज भी कहीं-कहीं जीवित है। होली से एक-दो दिन पहले या होली की सुबह ही घर की महिलाएँ सरसों के तेल में बेसन, हल्दी या आटा मिलाकर उबटन तैयार करती थीं। फिर बच्चों से लेकर बड़ों तक सबको बैठाकर प्यार से यह उबटन लगाया जाता था। यह केवल शरीर पर लगाया जाने वाला लेप नहीं था, बल्कि परिवार के स्नेह और देखभाल का प्रतीक था। सरसों के उबटन की सुगंध में बसता था फागुन जब सरसों का उबटन शरीर पर लगाया जाता था तो उसकी हल्की-सी खुशबू पूरे आँगन में फैल जाती थी। मिट्टी का आँगन, धूप की नरमी और सरसों के उबटन की महक – यही पूर्वांचल की होली की असली पहचान...
सौदाला का जातिमुक्त सपना और हमारी सामाजिक सच्चाई ” हाल ही में महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव सौदाला को जातिमुक्त गांव घोषित किया गया। यह खबर सुनकर मन में आशा भी जगी और एक गहरी सोच भी पैदा हुई। लगा कि शायद भारत का गांव सच में बदल रहा है — वह गांव, जहाँ कभी पहचान नाम से पहले जाति से होती थी, अब बराबरी की बात कर रहा है। सौदाला का यह कदम केवल एक घोषणा नहीं, बल्कि एक सपना है — ऐसा समाज जहाँ इंसान की पहचान उसकी मेहनत और उसके चरित्र से हो, न कि उसकी जाति से। यह विचार बहुत सुंदर है, और शायद हर संवेदनशील व्यक्ति का सपना भी। लेकिन जब मैं अपने आसपास के समाज को देखती हूँ, खासकर उत्तर भारत और कुछ पिछड़े इलाकों को, तो महसूस होता है कि जातिवाद अभी भी हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बना हुआ है। गांवों में आज भी रिश्ते जाति देखकर तय होते हैं, कई जगह साथ बैठकर खाना भी सहज नहीं है, और पहचान पूछते समय अक्सर पहला सवाल यही होता है — “कौन सी जाति?” ऐसे में मन कहता है कि सौदाला का कदम सही है, लेकिन हर जगह तुरंत लागू कर देना शायद आसान नहीं होगा। समाज की सोच बदलना किसी सरकारी आदेश य...