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योग द्वारा रोग निवारण(Disease prevention by yoga)

पहला योग दिवस 

पहला योग दिवस 21 जून 2015 को पूरे विश्व में पहली बार मनाया गया लेकिन भारत के अपील के बाद 27 सितंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के प्रस्ताव को अमेरिका द्वारा मंजूरी दी। जिसे बाद हर साल 21 जून को योग दिवस मनाया जाता है।bपहला योग दिवस वर्ष 2015 में मनाया गया था, जिसकी थीम थी: "Yoga for Harmony and Peace" (सामंजस्य और शांति के लिये योग)

योग दिवस 21 जून को क्यों मनाया जाता है?

हर साल अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 21 जून को मनाया जाता है लेकिन क्या आप जानते हैं योग दिवस 21 जून को क्यों मनाया जाता है? दरअसल 21 तारीख को उत्तरी गोलार्द्ध का सबसे लंबा दिन होता है जिसे ग्रीष्म संक्रांति कहते हैं। वहीं भारतीय परंपरा के अनुसार ग्रीष्म संक्रांति बाद सूर्य दक्षिणायन होता है। सूर्य दक्षिणायन का समय आध्यात्मिक सिद्धियों को प्राप्त करने के लिए असरदार है इस कारण प्रतिवर्ष 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाता है।

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 2025 की थीम



अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 2025 का विषय, " एक पृथ्वी, एक स्वास्थ्य के लिए योग ", व्यक्तिगत स्वास्थ्य और हमारे ग्रह के स्वास्थ्य के बीच संबंध को दर्शाता है।


योग एक परिचय 

 परिभाषा
 चित्तवृत्तियों का निरोध ही योग है । दु : ख से छूटने और आनन्द को प्राप्त करने का अहसास ही योग है । योग शब्द के बारे में विद्वानों के अपने - अपने मत हैं । कुछ विद्वानों ने योग शब्द को ' वियोग ' , ' उद्योग ' और ' संयोग ' के अर्थों में लिया है , तो कुछ लोग योग को आत्मा और प्रकृति के वियोग का नाम देते हैं । कुछ कहते हैं कि यह एक विशेष उद्योग अथवा यत्न का नाम है , जिसकी सहायता से आत्म स्वयं को उन्नति के शिखर पर ले जाती है । इसी संबंध में कुछ लोगों का विचार है कि योग ईश्वर और प्राणी के संयोग का नाम है । सच तो यह है कि योग में ये तीनों अंग सम्मिलित हैं । अंतिम उद्देश्य संयोग है , जिसके लिए उद्योग की आवश्यकता होती है और इसी उद्योग का स्वरूप ही यह है कि प्रकृति से वियोग किया जाए ।

योगासनों के गुण और लाभ 
( 1 ) योगासनों का सबसे बड़ा गुण यह है कि वे सहज साध्य और सर्वसुलभ हैं । योगासन ऐसी व्यायाम पद्धति है जिसमें न तो कुछ विशेष व्यय होता है और न इतनी साधन - सामग्री की आवश्यकता होती है । 
( 2 ) योगासन अमीर - गरीब , बूढ़े - जवान , सबल - निर्बल सभी स्त्री - पुरुष कर सकते हैं । 
( 3 ) आसनों में जहाँ मांसपेशियों को तानने , सिकोड़ने और ऐंठने वाली क्रियाएँ करनी पड़ती हैं , वहीं दूसरी ओर साथ - साथ तनाव - खिंचाव दूर करने वाली क्रियाएँ भी होती रहती हैं , जिससे शरीर की थकान मिट जाती है और आसनों से व्यय शक्ति वापिस मिल जाती है । शरीर और मन को तरोताजा करने , उनकी खोई हुई शक्ति की पूर्ति कर देने और आध्यात्मिक लाभ की दृष्टि से भी योगासनों का अपना अलग महत्त्व है । 
 4 ) योगासनों से भीतरी ग्रंथियाँ अपना काम अच्छी तरह कर सकती हैं और युवावस्था बनाए रखने एवं वीर्य रक्षा में सहायक होती हैं ।
 ( 5 ) योगासनों द्वारा पेट की भली - भाँति सुचारू रूप से सफाई होती है और पाचन अंग पुष्ट होते हैं । पाचन - संस्थान में गड़बड़ियाँ उत्पन्न नहीं होती ।
 ( 6 ) योगासन मेरुदण्ड - रीढ़ की हड्डी को लचीला बनाते हैं और व्यय हुई नाड़ी शक्ति की पूर्ति करते हैं । 
( 7 ) योगासन पेशियों को शक्ति प्रदान करते हैं । इससे मोटापा घटता है और दुर्बल - पतला व्यक्ति तंदुरुस्त होता है।
 ( 8 ) योगासन स्त्रियों की शरीर रचना के लिए विशेष अनुकूल हैं । वे उनमें सुंदरता , सम्यक - विकास , सुघड़ता और गति , सौंदर्य आदि के गुण उत्पन्न करते हैं ।
 ( 9 ) योगासनों से बुद्धि की वृद्धि होती है और धारणा शक्ति को नई स्फूर्ति एवं ताजगी मिलती है । ऊपर उठने वाली प्रवृत्तियाँ जाग्रत होती हैं और आत्म - सुधार के प्रयत्न बढ़ जाते हैं ।
 ( 10 ) योगासन स्त्रियों और पुरुषों को संयमी एवं आहार - विहार में मध्यम मार्ग का अनुकरण करने वाला बनाते हैं , अतः मन और शरीर को स्थाई तथा सम्पूर्ण स्वास्थ्य , मिलता है ।
 ( 11 ) योगासन श्वास - क्रिया का नियमन करते हैं , हृदय और फेफड़ों को बल देते हैं , रक्त को शुद्ध करते हैं और मन में स्थिरता पैदा कर संकल्प शक्ति को बढ़ाते हैं ।
 12 ) योगासन शारीरिक स्वास्थ्य के लिए वरदान स्वरूप हैं क्योंकि इनमें शरीर के समस्त भागों पर प्रभाव पड़ता है , और वह अपना कार्य सुचारू रूप से करते हैं । 
( 13 ) आसन रोग विकारों को नष्ट करते हैं , रोगों से रक्षा करते हैं , शरीर को निरोग , स्वस्थ एवं बलिष्ठ बनाए रखते हैं । ( 14 ) आसनों से नेत्रों की ज्योति बढ़ती है । आसनों का निरंतर अभ्यास करने वाले को चश्में की आवश्यकता समाप्त हो जाती है । 
( 15 ) योगासनों से शरीर के प्रत्येक अंग का व्यायाम होता है , जिससे शरीर पुष्ट , स्वस्थ एवं सुदृढ़ बनता है । आसन शरीर के पाँच मुख्यांगों , स्नायु तंत्र , रक्ताभिगमन तंत्र , श्वासोच्छवास तंत्र की क्रियाओं का व्यवस्थित रूप से संचालन करते हैं जिससे शरीर पूर्णतः स्वस्थ बना रहता है और कोई रोग नहीं होने पाता । 
          शारीरिक , मानसिक , बौद्धिक और आत्मिक सभी क्षेत्रों के विकास में आसनों का अधिकार है । अन्य व्यायाम पद्धतियाँ केवल बाह्य शरीर को ही प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं , जब कि योगासन मानव का चहुंमुखी विकास करते हैं । 
योगासनों के लिए अन्य नियम-
( 1 ) आसन शांत स्वभाव से करें । अनावश्यक तौर पर हँसना , बात - बात है क्रोध करना , चिंता करने से आसन का बुरा प्रभाव पड़ता है ।
 ( 2 ) आसन शुद्ध हवा में करना चाहिए । 
( 3 ) आसन शौच निवृत्त होकर बिना कुछ खाये - पीये करना चाहिए । 
( 4 ) मिट्टी के तेल की रोशनी में आसन न करें , बिजली , सरसों का तेल अथवा मोमबत्ती का प्रयोग करना चाहिए ।
 ( 5 ) आसन शुद्ध हवा में करें । दुर्गन्धयुक्त स्थान में आसन न करें । 
( 6 ) आसन करने का स्थान एकांत हो , वहाँ पर या तो आसन करने वाले साधक हों , या बताने वाले गुरु हों ।
 ( 7 ) तख्त या ऊँचे स्थान पर आसन करने में सावधानी बरतें , असावधानी से गिरने का भय रहता है । 
( 8 ) जहाँ मच्छर , मक्खियाँ आदि बैठती हों , वहाँ आसन नहीं करना चाहिए । 
( 9 ) आसन करने से यदि किसी प्रकार का विकार पैदा हो तो आसन बंद कर देना चाहिए । आगे आसनों की पुनः शुरुआत योग्य जानकार की सलाह से करें ।
 ( 10 ) योगासनों के दौरान पेट व आंतें खाली रहें , तो विशेष लाभ हो सकता है । यदि कब्ज हो , तो एक बार एनीमा से पेट साफ कर लेना चाहिए ।
 ( 11 ) योगाभ्यास करते समय मौन रहना चाहिए । शक्ति की रक्षा करने तथा अभ्यास के समय एकाग्र रहने में मौन धारण से बड़ी सहायता मिलती है । 
योगासन के प्रकार
 1.ध्यान के आसन 
पद्मासन विधि : पैरों को सामने फैलाकर बैठ जाइए । दाहिने पैर को मोड़कर बाई जांघ पर इस प्रकार रखें कि एड़ी कुल्हे की हड्डी का स्पर्श करें । तलवा ऊपर की ओर रहे । इसी तरह बाएं पैर को दाहिनी जांघ पर स्थापित करें । हो सके तो दोनों एड़ियों को सटाइए।दोनों हाथों को ज्ञानमुद्रा अथवा चिन्मुद्रा में घुटनों पर रखें । कमर व गर्दन सीधी रखें । आज्ञाचक्र पर भ्रूमध्य में ध्यान करें । आँखें बंद रखें । चट्टान जैसी स्थिरता की भावना के साथ तीन घण्टे तक लगातार बैठने की क्षमता आने तक अभ्यास करें । आसन जप के बिना प्राणायाम व ध्यान सफल नहीं हो सकता।
 लाभ : जैसा नाम वैसा काम , जैसे पद्म ( कमल ) पानी में रहते हुए भी पानी से अलग रहता है वैसे साधक संसार में रहते हुए संसार से अलग रह सकता है । अत : यह ध्यान के लिए सर्वश्रेष्ठ आसन है क्योंकि इससे पैरों में रक्त संचार कम होकर मस्तिष्क में रक्त प्रवाह बढ़ता है । पूरा नाड़ी - संस्थान पुष्ट होता है जिससे पैरों के दोष गठिया , साइटिका आदि दूर हो जाते हैं । नाभि के बाईं ओर स्थित सरस्वती नाड़ी के दबने से सुषुम्ना नाड़ी से प्राण संचार होने लगता है - ध्यान के लिए अति आवश्यक है । इस आसन से शक्ति संचय होती है क्योंकि इद्रिय शांत होती हैं और पैरों , पंजों तथा अंगुलियों के पोरों से ऊर्जा बाहर नहीं जाती है । पाचन शक्ति बढ़ती है और मन शीघ्र एकाग्र होता है । 
सिध्दासन
विधि : पैरों को सामने फैलाकर बैठे । बाएं पैर को मोड़कर एड़ी से गुदा और जननेन्द्रिय के बीच में स्थित सीचन नाड़ी को दबाते हुए तलवे को दाईं जांघ से सटाइए । दाएं पैर को मोड़कर एड़ी को जननेन्द्रिय के मूल पर इस प्रकार रखें कि बाएं पैर के टखने पर दाएं पैर का ठखना आ जाए । अब बाएं पंजे को जांघ व पिण्डली के बीच में स्थिर करें । कमर व गर्दन सीधी रहें । आँखे बंद करके हाथों को ज्ञानमुद्रा अथवा चिन्मुद्रा में रखें । ध्यान का केंद्र आज्ञाचक्र । ध्यान रहे केवल पुरुषों को यह आसन करना चाहिए । महिलाओं को सिद्धयोनि आसन करना चाहिए ।
जिन्हें साइटिका व रीढ़ के निचले भाग में गड़बड़ी हो उन्हें यह आसन नहीं करना चाहिए । 
लाभ : इसका भी जैसा नाम वैसा काम - क्योंकि योग में ब्रह्मचर्य का पालन मुख्य साधन है । इस आसन से ब्रह्मचर्य सिद्ध होता है । वीर्य संबंधी सभी दोष दूर हो जाते हैं और वीर्य ऊर्ध्वगामी हो जाता है । प्राण व मन में स्थिरता व उपस् की शुक्रवाहिनी नाड़ियों के शिथिल होने से मूलबंध और वज्रोलि मुद्रा लग जाती है , फलस्वरूप शरीर की तीनों शक्तियाँ ( भावनात्मक , मानसिक शारीरिक ) संतुलित होती हैं जिससे ध्यान अनायास होने लगता है । 
स्वास्तिकासन
 लाभ : स्वास्तिक का अर्थ है । मंगलकारी । अतः यह आसन साधक क प्रसन्नता व सर्वसुख देता है । अभ्यास इसमें सरलतापूर्वक कर सकते हैं । संपूर्ण नाड़ी संस्थान इससे सक्रिय होता है । पैरों में ठण्ड पड़ना व दर्द मिटता है तथा पसीना निकलने की बीमारी ठीक होती है । जप - त्राटकादि क्रियाओं के लिए सरल एवं लम्बे समय तक बिना परेशानी के इस आसन में बैठ सकते हैं ।
 सुखासन 
लाभ : नाम के अनुसार इसमें अधिक समय बैठने पर भी थकान व तनाव रहित शरीर के कारण देह , प्राण , मन आदि को सुख मिलता है । अन्य ध्यान के आसन के अभ्यास के योग्य बनाता है । श्वास - प्रश्वास की गति सम रहती है। 
2.बैठकर किए जाने वाले आसन
 वज्रासन
सिंहासन विधि 
वज्रसान में बैठिए । घुटनों को जितना हो सके उतनी दूरी पर रखें । अंगुलियों को अपने शरीर की तरफ करते हुए हाथों को घुटनों के बीच में जमाइए । सीधी भुजाओं के सहारे थोड़ा आगे की ओर झुकिए।
सिर को पीछे की ओर लटकाकर जितना सम्भव हो उतना मुँह खोलिए । जीभ को बाहर निकाल लिए । आँखों को खोलकर भ्रूमध्य पर केंद्रित करें । नाक से श्वास लेकर मुँह से स्पष्ट एवं स्थिर आवाज निकालते हुए धीरे - धीरे श्वास छोड़िए । जीभ को दाएं - बाएं घुमाते हुए श्वास छोड़ सकते हैं । कम से कम दस बार दोहराइए । रोगी को पंद्रह - तीस बार करना चाहिए । 
लाभ : हकलाकर बोलने वालों तथा गले , नाक , कान और मुँह की बीमारियों को दूर करने के लिए यह श्रेष्ठ आसन है । इससे स्वस्थ , गंभीर और मधुर स्वर का विकास होता है । इस आसन को सर्वरोगहर भी कहते हैं । अत : स्वस्थ व्यक्ति को भी नित्य करना चाहिए ताकि कोई रोग न सताए।
भद्रासन 
लाभ : आध्यात्मिक लक्ष्य को प्राप्त करने में अत्यन्त उपयोगी है क्योंकि मूलाधार - चक्र में स्थित कुण्डलिनी शक्ति इस आसन से शीघ्र ही उत्तेजित होकर सक्रिय होती है । शारीरिक दृष्टि से यह आसन शरीर में उत्पन्न होने वाले समस्त विषैले पदार्थों को नष्ट कर देता है । फलतः शरीर नीरोग हो जाता है।
उष्ट्रासन
लाभ : रीढ़ की सारी न्यूनताएँ - टेढ़ापन , स्लिपडिस्क , स्पोण्डीलाइटिस , साइटिका आदि समाप्त होते हैं । फेफड़ों में श्वास रोकने की क्षमता बढ़ती है । जंघा , उदर और छाती प्रदेश की अतिरिक्त चर्बी घटती है । हृदयरोग एवं महिलाओं की मासिक धर्म संबंधी समस्याएँ दूर होती हैं । पाचन प्रणाली , विसर्जन प्रणाली एवं प्रजनन मणालियों के लिए लाभप्रद है।


शशांकासन  
लाभ : आध्यात्मिक दृष्टि से मूलाधार चक्र पर ध्यान करें अन्यथा स्वाधिष्ठान अथवा मणिपुर - चक्र पर ध्यान करें । इससे काम विकार दूर होता है । साइटिका के स्नायुओं को शिथिल करता है और एड्रिनल ग्रंथियों को नियमित करता है । कुल्हों और गुदाक्षेत्र की मांसपेशियों को सामान्य रखता है । पाचन प्रणाली सक्रिय होती है । दमें के रोग को नियंत्रित करने में उपयोगी है । क्रोधादि हर प्रकार के आवेश तथा भावनात्मक असंतुलन को समाप्त करता है ।
योगमुद्रा
लाभ : यह पेट और उससे संबंधित शरीर के अन्य भागों की मालिश तो कोष्ठबद्धता में लाभ करता है । रीढ़ की समस्त कशेरुकाओं को एक - दूसरे । अलग कर साफ व हल्का करता है । फलतः सुषुम्ना नाड़ी एवं मणिपुर - चा सम्यक् प्रकार से जाग्रत होते हैं । उदर संबंधी सभी रोग दूर होते हैं । पाचन ए विसर्जन प्रणाली सुदृढ़ होती हैं । पौरुषग्रंथि ( Prostate gland ) बढ़ती - घटती गई अपितु संतुलित रहती है । मोटापा कम करता है । मस्तिष्क के विकास के लिए अत्यंत उपयोगी आसन है ।
बद्धपद्मासन
लाभ : उदर संबंधी रोगों के लिए फायदेमंद है । बच्चों के विकास तथा अविकसित सीने को पुष्ट और मजबूत करता है । महिलाओं में सन्तानोत्पत्ति के बाद पेट पर पड़ी झुर्रियाँ दूर होती हैं । स्तनों में दूध की कमी की पूर्ति होती है । हाथ , गर्दन , कन्धे , पीठ आदि स्वस्थ होंगे । मिर्गी , दमा , भगन्दर , हर्निया , वीर्य विकार , साइटिका आदि में अत्यंत उपयोगी है।
मत्स्यासन 
लाभ : उदर संबंधी रोगों में अत्यंत उपयोगी है । कोष्ठबद्धता एवं पीठ में रक्त के जमघट को दूर करता है । इस आसन का विकल्प सुप्तवज्रासन है ।
कुक्कुटासन 
विधि : कुक्कुट का अर्थ है मुर्गा । पद्यासन में बैठकर पिंडलियों और जांघ के बीच से हाथों को अंदर कीजिए । अंगुलियों को सामने की ओर करते हुए । हथेलियों को जमीन पर जमाइए । पूरे शरीर को हाथों के सहारे ऊपर उठाकर जितनी देर आराम से रुक सकें , रुकिए । स्वाभाविक श्वास चलता रहे । फिर वापस जमीन पर आइए । पाँच बार दोहराइए । ध्यान का केंद्र - अनाहत चक्र । 
लाभ : हाथों , कन्धों व सीने को पुष्ट करेगा । आलस्य दूर होगा । सीने की चौड़ाई एवं हाथों को लम्बाई बढ़ेगी । यह सीने संबंधी रोगों में अत्यन्त उपयोगी है । 
गोमुखासन
लाभ : गठिया , साइटिका , बवासीर , जांघ के एवं पैर के नाड़ी - दोष , अपच , मन्दाग्नि , पीठ दर्द , हाथों के दर्द को दूर करता है । यह मधुमेह रोग में अत्यंत उपयोगी है। ब्रह्मचर्य की रक्षा होगी क्योंकि सहज की मूल - बंध का अभ्यास होता है। अतः लैंगिक विकारों को दूर करता है। छाती को पुष्ट करता है।
पश्चिमोत्तानासन
 
लाभ : इससे ब्रह्मनाड़ी , सुषम्ना और जठराग्नि जाग्रत होते हैं । पेट , कमर एवं नितम्बों की अनावश्यक चर्बी को घटाकर स्वस्थ करता हैं । मोटापा , कोष्ठबद्धता , कब्ज , बवासीर आदि से छुटकारा मिलता है । उदर संस्थान की समस्त ग्रंथियों को क्रियाशील करता है । मधुमेह आदि रोगों में फायदेमंद है । स्त्रियों के लिए प्रजनन संबंधी अंगों के रोगों को दूर करने में उपयोगी है । इससे पीठ दर्द एवं अन्य रीढ़ की हड्डी की समस्याएं दूर होती हैं ।
अब इस आसन का गत्यात्मक करें अर्थात् लेट जाएं , पैरों को सटाकर तानकर रखें । हाथों को भी सिर के ऊपर जमीन पर सीधे तानकर रखें । श्वास लेते हुए हाथों को बिना मोड़े धड़ भाग को उठाएं और सीधा बैठे । श्वास छोड़ते हुए पश्चिमोत्तासन करें । वापस प्रथम लेटी हुई स्थिति में लौटें । इसे गत्यात्मक पश्चिमोत्तासन कहते हैं । 
जानुशिरासन ( अर्ध - पश्चिमोत्तानासन)
लाभ : पश्चिमोत्तनासन के सभी लाभ प्रायः इससे प्राप्त हो सकते हैं । विशेषतः यौनविकार , वीर्यदोष , मधुमेह , पैर के साइटिका , आंतों की गर्मी , वायु प्रकोप एवं मूत्रावरोध में उपयोगी है।
पूर्णमत्स्येन्द्रासन
लाभ : रीढ़ की मालिश होती है इसलिए रीढ़ की समस्त समस्याएँ जैसे साइटिका , स्पोंडिलाइटिस , सिर का माईग्रेन आदि दूर होते है । पाचन प्रणाली को संतुलित करता है । मधुमेह पुरानी पेचिश , पेट के कीड़े एवं अन्य पाचन संबंधी रोगों से मुक्ति होती है । समस्त नाड़ी संस्थान पर अच्छा प्रभाव पड़ता है । नसों की दुर्बलता एवं अन्य नाड़ी दोष दूर होते हैं । मस्तिष्क से संबंधित नाड़ियों को शक्तिशाली बनाता है ।
खड़े होकर किए जाने वाले आसन 
कटिचक्रासन
लाभ : यह कमर , पीठ , कुल्हों में मेरुदण्ड तथा शरीर के अन्य जो तनाव को दूर करता है।
तिर्यक ताड़ासन 
लाभ : मलाशय एवं आमाशय की मांसपेशियों को विकसित तों को फैलाता है । मेरुदण्ड और स्नायु के विकास के लिए अवरोधक को दूूर करता है।


 
विभिन्न रोगों में किन - किन योगासनों से लाभ प्राप्त हो सकता है , इनका विवरण इस प्रकार है-
 1. पेट की बीमारियाँ : पद्मासन , सुखासन , उत्तानपादासन , पवनमुक्तासन भुजंगासन , शलभासन , पश्चिमोत्तानासन , शवासन ।
 2. मधुमेह : धनुरासन , मत्स्येन्द्रासन , सुप्तवज्रासन , अर्धवक्रासन , सूर्य नमस्कारासन , नौकासन । 
3. दमा : शीर्षासन , शवासन , सर्वांगासन , मत्स्यासन , शलभासन , उष्ट्रा आसन , सुप्तवज्रासन और उज्जयी प्राणायाम । 
4. सिर की बीमारियों में : सर्वांगासन , चंद्रासन , शीर्षासन । 5. नेत्र रोग : सर्वांगासन , ऊर्ध्वसर्वांगासन , शीर्षासन , भुजंगासन
6. अनिद्रा : शीर्षासन , योगनिद्रा , शीतली व शीताकरी प्राणायाम , हलासन । 
7. गठियाः पवनमुक्तासन , पश्चिमोत्तानासन , धनुरासन , त्रिकोणासन जानुशिरासन , पर्वतासन , गोमुखासन अर्धमत्स्येन्द्रासन । 
8. मोटापा : धनुरासन , पश्चिमोत्तनासन , त्रिकोणासन , हलासन , शलाभासन , सर्वांगासन , पादहस्तासन , नाड़ीशोधन प्राणायाम , लोागुलासन और उड्डियानाबंधा
 9. गले संबंधी रोग : शीर्षासन , सर्वांगासन , हलासन , सिंहासन , चंद्रासन , भुजंगासन , सुप्तवज्रासन , मत्स्यासन । 10. बवासीर , गुदा भगंदर : सुखासन , सर्वांगासन , जानुशिरासन , उत्तानपादासन , चंद्र नमस्कारासन उष्ट्रासन , भद्रासन , सिद्धासन , गोमुखासन , पश्चिमोत्तानासन । 
11. वीर्य रोग : सर्वांगासन , वज्रासन , बद्धपद्मासन , गोमुखासन । 12. हकलाना : नौकासन , सिंहासन , शीर्षपादासन । 13. जुकाम : सर्वांगासन , हलासन , शीर्षासना 
14. प्रमेह : सर्वांगासन और हलासन । 
15. नाभि : नाभि आसन , भुजंगासन , धनरासन
16. गैस : जानुशिरासन , खगासन , वज्रासन , पवनमुक्तासन । 17. खून की कमी : हलासन , पश्चिमोत्तानासन , भुजंगासन , शीर्षासन मत्स्यासन , सर्वांगासन , शलभासन , सूर्यनमस्कारासन । 
18. तीव्र रक्तचाप : शशंकासन , पवनमुक्तासन और वज्रासन 19. रक्तचाप की कमी : वृश्चिकासन , मयूरासन , दोलासन , चक्रासन । 
20. शक्ति विकास : वृश्चिकासन , मयूरासन , दोलासन 
 21. यकृत रोग : हलासन , धनुरासन , मयूरासन , शीर्षासन , भुजगासन , पश्चिोमत्तानासन , शलभासन , बद्धपद्मासन , शशंकासन , सर्वांगासन और उष्ट्रासना 
22. बहरापन : शीर्षासन और सिंहासन । 
23. मानसिक तनाव : शीर्षासन , शलभासन , हलासन , वज्रासन , शवासन , गर्भासन , शशांकासन सर्वांगासन ।
 24. संधिशोध ( जोड़ों का दर्द ) : संतुलन आसन , त्रिकोणासन , गोमुखासन , सिद्धासन , नटराजासन , वृक्षासन , वीरासन और सेतुबंध आसन ।
 25. कमर दर्द : चक्रासन , धनुरासन , हलासन तथा भुजंगासन , वृक्षासन , मयूरासन , शशंकासन , उष्ट्रासन , मत्स्यासन , गोमुखासन , वज्रासन , सुखासन , पद्मासन , त्रिकोणासन , उत्कटासन , पादशलभासन , नौकासन । 
26. फेफडे ( फुफ्फुस ) : वज्रासन , मत्स्यासन और सर्वांगासन ।
 27. स्नायु निर्बलता : हलासन , चक्रासन , धनुरासन , गर्भासन , वज्रासन शीर्षासन , सर्वांगासन , शलभासन , शशांकासन , पश्चिमोत्तानासन । 
28. स्नायुविक तनाव : कूर्मासन , शवासन । 
29. गुर्दे के रोग : उर्द्धमत्स्येन्द्रासन , उष्ट्रासन , भुजंगासन , गोमुखासन , शशंकासन , धनुरासन,हलासलन
वात रोग : धनुरासन , वज्रासन , पद्मासन । 
31. लीवर : सूर्यनमस्कार, शलभासन , शीर्षासन , शशांकासन , भुजंगासन , हलासन और धनुरासन ।
 32. कब्ज : जानुशिरासन , मयूरासन , चक्रासन , ताड़ासन , भुजंगासन , धनुरासन , भूमिपादमस्तकासन , सुप्त वज्रासन , कर्णपीड़ासन , पादहस्तासन , मत्स्यासन । 
33. कीड़े : मत्स्येन्द्रासन , वृश्चिकासन , मयूरासन , नौकासन , उत्थित मेरुदण्डासन , सर्वांगासन , शीर्षासन और पश्चिमोत्तनासन । 
34. खाँसी : शीर्षासन , उर्ध्व सर्वांगासन , मत्स्यासन , जानुशिरासन , सुप्तवज्रासन ।
 35. रीढ़ की हड्डी के लिए : वृश्चिकासन , शशांकासन , हलासन , धनुरासन , चक्रासन , त्रिकोणासन , भुजंगासन , शीर्षासन , उष्ट्रासन और पश्चिमोत्तानासन ।
 36. मासिक धर्म संबंधी रोग : शीर्षासन , धनुरासन , हलासन , शवासन , सर्वांगासन , वज्रासन , भुजंगासन , मत्स्यासन , शलभासन , पर्वतासन ।
 37. बांझपन : सर्वांगासन , शीर्षासन , पश्चिमोत्तानासन , मत्स्यासन , सुप्तवज्रासन ।  
38. कामशक्ति की निर्बलता : भुजंगासन , पश्चिमोत्तानासन , शीर्षासन , चक्रासन , सर्वांगासन , कन्धरासन , गरुड़ासन , वातायानासना
 39. यौन विकार : धनुरासन , सर्वांगासन और शीर्षासन । 40. सूजन : ऊर्ध्वसर्वांगासन और शीर्षासन । 
41. थकावट : शवासन , मत्स्यासन , दण्डासन और प्रेतासन 42. आंतों के विकार : सर्वांगासन , वृक्षासन , मयूरासन , सामन , चक्रासन , जानुशिरासन , मत्स्येन्द्रासन ।
 43. अम्लता : शलभासन । 
44. खट्टी डकारें : सर्वांगासन , पश्चिमोत्तानासन , शीर्षासन , भुजंगासन , जानुशिरासन , चक्रासन , उष्ट्रासन । 
45. बाहों संबंधी रोग : ऊर्ध्वपद्मासन , द्विहस्तभुजासन , कुक्कुटासन,ज्येष्टिकासन , लोलासन , धनुरासन , वक्रासन और चक्रासन । 
46. जंघारोग : पश्चिमोत्तानासन , मत्स्येन्द्रासन , सर्वांगासन , जानुशिरासन कर्णपीड़नासन , हस्तपदांगुष्ठासन । 
47. बुद्धि विकृति : शीर्षासन , ऊर्ध्वसर्वांगासन ।
 48. पीठ दर्द : भुजंगासन , सुप्तवज्रासन , धनुरासन , शशांकासन , गोमुखासन और पश्चिमोत्तानासन । 
49. पैर संबंधी रोग : वज्रासन , गरुड़ासन , वीरासन , पद्मासन , पर्वतासन , हनुमानासन , कान्धारासन । 
50. साइटिका : गोमुखासन , हनुमानासन और वज्रासन । 51. आंत्र वृद्धि : सर्वांगासन और शीर्षासन ।

                                                                               

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  मानवता की अमूल्य धरोहर है कुंभ  तीर्थयात्रियों, कल्पवासियों एवं स्नानार्थियों का संगम है कुंभ यह आस्था का सैलाब व  चुम्बकीय शक्ति है जो,  विश्व को अपनी ओर खिंचती है। कुंभ को भारतीय संस्कृति का महापर्व और विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक मेला माना जाता है। जहाँ कोई आमंत्रण अपेक्षित नहीं होता है। फिर भी करोड़ो यात्री देश-विदेश से इस पर्व को मनाने के लिए इस पावन संगम पर एकत्र होते है।           वैश्विक पटल पर शांति और सामंजस्य का प्रतीक मानते हुए वर्ष 2017 में यूनेस्को ने कुम्भ मेले को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में मान्यता प्रदान की है।            कुंभ की गहराई में उतरने के लिए हमें यह समझना होगा कि -   दिल लगाना हो तो बनारस जाइएगा।  और सुकून पाना हो तो महाकुंभ आइएगा ॥            तो आइए मिलकर लगाते हैं कुम्भ रूपी मेले में डुबकी जहाँ आस्था, आध्यात्म और कहानियों में विलीन होकर सुकून का अनुभव प्राप्त करते हैं। तुम ताजमहल के आगे सेल्फी लेती  मैं प्रयागर...

डॉ. भीमराव अंबेडकर केवल जाति सुधारक थे या समाज सुधारक भी?

  कोई भी व्यक्ति अपने आसपास के वातावरण में होने वाली गतिविधियों से सीखता है तथा जीवन के अनुभव को ग्रहण करता है और उन्ही अनुभव को कायदे कानून मानते हुए जीवन के रास्ते में ऊंचाइयों तक बढ़ता है। ऊंचाइयों तक पहुंचने वाले व्यक्ति महान व्यक्तित्व के रूप में उभरकर सामने आते हैं। उन्हीं महान व्यक्तित्व में से एक शानदार व्यक्ति है डॉक्टर भीमराव बाबासाहेब रामजी आंबेडकर  परंतु    वर्तमान में इन्हें जाति विशेष का नेता मान लिया गया जबकि उससे कहीं ज्यादा उन्होंने  भारतीय महिलाओं की स्थिति सुधारने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई क्योंकि जातिवाद से कहीं ज्यादा महिलाओं की स्थिति दयनीय थी।   जबकि दूसरे नंबर पर जातिवाद की समस्याए है।आज भी अधिकतर महिलाएं अपने अधिकारों को नहीं जानती है इसलिए अंबेडकर जी के महत्वाकांक्षा को समझने में असमर्थ है। उन्होंने केवल जाति विशेष को दर्जा नहीं दिलाया बल्कि समाज के उन सभी वंचित वर्गों को अधिकार दिलाया जो उसके हकदार थे परंतु जिस  हर्षोल्लास के साथ अंबेडकर जयंती निम्न जाति के लोगों द्वारा मनाया जाता है उतनी जश्न के साथ  उच्च जाति तथ...