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होली से पहले सरसों का उबटन

 

होली से पहले सरसों का उबटन : पूर्वांचल की मिट्टी से जुड़ी एक स्नेहभरी परंपरा

पूर्वांचल की होली केवल अबीर-गुलाल और रंगों की मस्ती तक सीमित नहीं रही है। यहाँ होली आने से पहले ही घरों में एक अलग-सी तैयारी शुरू हो जाती थी – सरसों का उबटन बनाने की तैयारी। जैसे ही फागुन की हवा चलती और खेतों में पीली सरसों लहराती, वैसे ही घरों में दादी-नानी की आवाज सुनाई देती –
"होली आने वाली है, पहले सरसों का उबटन लगा लो, फिर रंग खेलना।"

यह परंपरा पूर्वांचल के गाँवों में आज भी कहीं-कहीं जीवित है। होली से एक-दो दिन पहले या होली की सुबह ही घर की महिलाएँ सरसों के तेल में बेसन, हल्दी या आटा मिलाकर उबटन तैयार करती थीं। फिर बच्चों से लेकर बड़ों तक सबको बैठाकर प्यार से यह उबटन लगाया जाता था। यह केवल शरीर पर लगाया जाने वाला लेप नहीं था, बल्कि परिवार के स्नेह और देखभाल का प्रतीक था।

सरसों के उबटन की सुगंध में बसता था फागुन

जब सरसों का उबटन शरीर पर लगाया जाता था तो उसकी हल्की-सी खुशबू पूरे आँगन में फैल जाती थी। मिट्टी का आँगन, धूप की नरमी और सरसों के उबटन की महक – यही पूर्वांचल की होली की असली पहचान थी।

बच्चे कई बार भागते थे, लेकिन माँ या दादी पकड़कर उबटन लगा ही देती थीं और हँसते हुए कहती थीं –
"नहीं लगाओगे तो रंग नहीं छूटेगा।"

रंगों से बचाने वाला प्राकृतिक कवच

पूर्वांचल में माना जाता था कि सरसों का उबटन शरीर पर एक सुरक्षा परत बना देता है। जब होली के गाढ़े रंग शरीर पर पड़ते थे तो वे त्वचा के अंदर नहीं घुसते थे। नहाते समय रंग आसानी से उतर जाते थे और त्वचा सुरक्षित रहती थी।

पुराने समय में रंग हमेशा शुद्ध नहीं होते थे। कई बार पक्के रंग भी इस्तेमाल होते थे। इसलिए सरसों का उबटन त्वचा को बचाने का सबसे सरल उपाय माना जाता था।

त्वचा को रोगों से बचाने का घरेलू उपाय

ग्रामीण समाज के लोग जानते थे कि होली के रंगों से खुजली या फुंसियाँ भी हो सकती हैं। इसलिए सरसों का उबटन लगाया जाता था ताकि त्वचा सुरक्षित रहे। सरसों शरीर को गर्माहट देती है और त्वचा को मजबूत बनाती है।

इसीलिए पूर्वांचल में कहा जाता था –
"सरसों का उबटन होली का साथी है।"

सादगी में छिपा लोकज्ञान

आज बाजार में होली से पहले तरह-तरह की क्रीम और लोशन मिलते हैं, लेकिन पहले के लोग प्रकृति से ही अपना बचाव ढूँढ लेते थे। खेतों में उगने वाली सरसों ही उनकी सबसे बड़ी सुरक्षा थी।

सरसों का उबटन महंगा नहीं था, लेकिन बहुत उपयोगी था। यह परंपरा हमें बताती है कि पूर्वांचल का जीवन प्रकृति के कितना करीब था।

खोती हुई परंपरा की याद

आज के समय में बहुत कम घरों में होली से पहले सरसों का उबटन लगाया जाता है। नई पीढ़ी शायद यह परंपरा जानती भी नहीं। लेकिन यह छोटी-सी परंपरा पूर्वांचल की सांस्कृतिक पहचान का एक सुंदर हिस्सा रही है।

शायद इसीलिए बुजुर्ग आज भी कहते हैं –

"पहले उबटन लगता था, फिर रंग लगता था –
तभी होली सच में होली लगती थी।"

पूर्वांचल की होली हमें यह सिखाती है कि परंपराएँ केवल मान्यता नहीं होतीं, उनमें जीवन का अनुभव और स्वास्थ्य की समझ छिपी होती है।

सरसों का उबटन केवल रंग छुड़ाने का साधन नहीं था,
बल्कि यह शरीर की सुरक्षा और परिवार के स्नेह का प्राकृतिक उत्सव था।


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