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Medicinal use of trees

पेड़ पौधों का मानव जीवन में बहुत महत्व

पेड़ हमारे जीवन का अस्तित्व हैं। पेड़ों के बिना धरती पर जीवन की कल्पना करना असंभव है। ये धरती पर अमूल्य सम्पदा के समान हैं। पेड़ों के कारण ही मनुष्य को अपनी आधारभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के संसाधन प्राप्त होते हैं।

यदि पेड़ न हों तो पर्यावरण का संतुलन ही बिगड़ जाये और सब ओर तबाही मच जाये। आजकल मनुष्य विकास के नाम पर कंकरीट के जंगल बना रहा है और वे भी इस प्राकृतिक सम्पदा की कीमत पर।यदि पेड़ काटने के साथ-साथ इनका रोपण न किया गया तो इस ग्रह पर जीवन की संभावनायें ही खत्म हो जायेंगी।

पेड़ों को हरा सोना भी कहा जाता है क्योंकि यह बहुत मूल्यवान सम्पदा है। धरती पर जीवन प्रदान करने वाली ऑक्सीजन और पानी प्रदान करने वाला मुख्य साधन पेड़ ही है। ऑक्सीजन प्रदान करने का कार्य और कोई नहीं कर सकता और पेड़ों के बिना पानी की कल्पना करना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है।

पेड़ वायु प्रदूषण कम करने में हमारी सहायता कर पर्यावरण को शुद्ध रखते हैं। मात्र वायु प्रदूषण ही नहीं ये, हानिकारक रसायनों का छानकर जल को भी साफ करते हैं।

हर उद्योग में पेड़ के उत्पाद का मुख्य योगदान रहता है। हमारे दैनिक जीवन में उपयोग होने वाली वस्तुओं में पेड़ों का बहुत महत्व है।

जितने अधिक पेड़ होंगे पर्यावरण भी उतना ही शुद्ध रहेगा।

आजकल लोगों को वायु प्रदूषण के कारण कई प्रकार के साँस के एवं अन्य रोगों से पीड़ित होना पड़ रहा है।

यदि पेड़ होंगे तो हवा में मिली हानिकारक गैसों को शोषित कर हमें स्वच्छ हवा प्रदान करेंगे और रोगों से छुटकारा भी। यदि हम पेड़ों की संख्या में वृद्धि करेंगे तो ये प्राकृतिक रुप से हवा को स्वच्छ करने के साथ हमें और भी कई फायदे पहुँचायेंगे।

इनकी वृद्धि से हम एयर कंडीशनर के उपयोग से बच कर इससे निकलने वाली हानिकारक गैसों से भी निजात दिलाते हैं। पेड़ के कारण ही हमें भरपूर वर्षा प्राप्त होती है।

पेड़ की जड़े मिट्टी को बांध कर रखती हैं जिनसे भूमि कटाव भी नहीं होता व भूमि जल को अच्छे से अवशोषित कर लेती है। यही जल भूमिगत जल बनकर हमें मनुष्य में पानी के अभाव से बचाता है। पेड़ हमें छाया प्रदान कर गर्मी के प्रभाव से भी धरती को बचाते हैं।

नीम(Azadirachta indica)

नीम भारतीय मूल का एक पर्ण- पाती वृक्ष है। यह सदियों से समीपवर्ती देशों- पाकिस्तानबांग्लादेशनेपालम्यानमार (बर्मा), थाईलैंडइंडोनेशियाश्रीलंका आदि देशों में पाया जाता रहा है। लेकिन विगत लगभग डेढ़ सौ वर्षों में यह वृक्ष भारतीय उपमहाद्वीप की भौगोलिक सीमा को लांघ कर अफ्रीकाआस्ट्रेलियादक्षिण पूर्व एशिया, दक्षिण एवं मध्य अमरीका तथा दक्षिणी प्रशान्त द्वीपसमूह के अनेक उष्ण और उप-उष्ण कटिबन्धीय देशों में भी पहुँच चुका है। इसका वानस्पतिक नाम Azadirachta indica है। नीम का वानस्पतिक नाम इसके संस्कृत भाषा के निंब से व्युत्पन्न है।

नीम एक बहुत ही अच्छी वनस्पति है जो की भारतीय पर्यावरण के अनुकूल है और भारत में बहुतायत में पाया जाता है। आयुर्वेद में नीम को बहुत ही उपयोगी पेड़ माना गया है। इसका स्वाद तो कड़वा होता है लेकिन इसके फायदे अनेक और बहुत प्रभावशाली है। 

उपयोग

१- नीम की छाल का लेप सभी प्रकार के चर्म रोगों और घावों के निवारण में सहायक है।

२- नीम की दातुन करने से दांत और मसूड़े स्वस्थ रहते हैं।

३- नीम की पत्तियां चबाने से रक्त शोधन होता है और त्वचा विकार रहित और कांतिवान होती है। हां पत्तियां अवश्य कड़वी होती हैं, लेकिन कुछ पाने के लिये कुछ तो खोना पड़ता है मसलन स्वाद।

४- नीम की पत्तियों को पानी में उबाल उस पानी से नहाने से चर्म विकार दूर होते हैं और ये खासतौर से चेचक के उपचार में सहायक है और उसके विषाणु को फैलने न देने में सहायक है।

५- नींबोली (नीम का छोटा सा फल) और उसकी पत्तियों से निकाले गये तेल से मालिश की जाये तो शरीर के लिये अच्छा रहता है।

६- नीम के द्वारा बनाया गया लेप बालो में लगाने से बाल स्वस्थ रहते हैं और कम झड़ते हैं।

७- नीम की पत्तियों के रस को आंखों में डालने से आंख आने की बीमारी में लाभ मिलता है(नेत्रशोथ या कंजेक्टिवाइटिस)

८- नीम की पत्तियों के रस और शहद को २:१ के अनुपात में पीने से पीलिया में फायदा होता है और इसको कान में डालने से कान के विकारों में भी फायदा होता है।

९- नीम के तेल की ५-१० बूंदों को सोते समय दूध में डालकर पीने से ज़्यादा पसीना आने और जलन होने सम्बन्धी विकारों में बहुत फायदा होता है।

१०- नीम के बीजों के चूर्ण को खाली पेट गुनगुने पानी के साथ लेने से बवासीर में काफ़ी फ़ायदा होता है।

मधुमेह में अत्यधिक लाभकारी है। २. इसका प्रयोग शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए किया जाता है। यह आयुर्वेद में एक प्रकार की औषधि है जी की नीम (Azadirachta indica) के पेड़ से निकली जाती है।

नीम की पाती खाने से मुह की बदबू दाड दर्द दात कुलना शरीर के अंदर के हनिकारिक बैक्टीरिया कैंसर की बिमारी खून साफ करना जीभ से स्वाद चरम रोग आँख न आना आलस न आना शरीर मे ऊर्जा का बना रहना कफ कोल्ड न होना,शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाना जैसे के सेकड़ो हज़ारो फायदे हमे नीम की पाती खाने से मिलता 

बकायन (वानस्पतिक नाम : Melia azedarach)

नीम की जाति का एक पेड़ है। भारत में प्रायः सभी प्रान्तों में पाया जाता है। नीम से छोटा एवं अचिरस्थाई होता है। इसके पत्ते कड़वे नीम के समान तथा आकार में कुछ बड़े होते हैं। बकाइन की लकड़ी इमारती कामों के लिए बहुत उपयोगी होता है। यह छायादार पेड़ होता है। इसके फल भी कड़वे नीम के फल के समान होते हैं।

इसको महानिम्ब भी कहते हैं। यह एक औषधीय पेड़ है। आयुर्वेद में बकायन का बहुत महत्त्व है। बकायन से विभिन्न रोगों का उपचार किया  जाता  है । बवासीर, नेत्ररोग, मुह के छाले, पेट मे दर्द, आँतो के कीड़े, प्रमेह, श्वेतप्रदर, खुजली, पेट के कीड़े आदि, अर्श में तो बकायन का बहुत महत्व है ।

मंगिफेरा इंडिका 

आम तौर पर आम के रूप में जाना जाता है, सुमाक और ज़हर आइवी फैमिली एनाकार्डिएसी में फूलों के पौधे कीएक प्रजाति है। यह भारतीय उपमहाद्वीप का मूल निवासी हैजहां यह स्वदेशी है। दुनिया के अन्य गर्म क्षेत्रों मेंसैकड़ों खेती की गई किस्मों को पेश किया गया है। यह एक बड़ा फल-वृक्ष है, जो लगभग 30 मीटर (100 फीट) की ऊंचाई और मुकुट की चौड़ाई और 3.7 मीटर (12 फीट) से अधिक के ट्रंक परिधि में बढ़ने में सक्षम है।

 सबसे पहले लिनियस द्वारा वानस्पतिक नामकरण में नामांकित किया गया था । आम भारत, पाकिस्तान और फिलीपींस का राष्ट्रीय फल और बांग्लादेश का राष्ट्रीय वृक्ष है। 

अमरूद ( वानस्पतिक नाम : सीडियम ग्वायवा, प्रजाति सीडियम, जाति ग्वायवा, कुल मिटसी)

 एक फल देने वाला वृक्ष है। वैज्ञानिकों का विचार है कि अमरूद की उत्पति वेस्ट इंडीज़ से हुई है।

अमरूद के अद्भुत गुण

अमरूद मीठा और स्वादिष्ट फल होने के साथ-साथ कई औषधीय गुणों से भरा हुआ है। सर्दियों में अमरूद खाने के फायदे ही फायदे हैं। दंत रोगों के लिए अमरूद रामबाण साबित होता है। अमरूद के पत्तों को चबाने से दांतों के कीड़ा और दांतों से सम्बंधित रोग भी दूर हो जाते हैं। इसके अलावा भी ये कई औषधीय गुणो के लिए जाना जाता है।

आँवला 

वैज्ञानिक नाम - रिबीस यूवा-क्रिस्पा

एक फल देने वाला वृक्ष है। यह करीब २० फीट से २५ फुट तक लंबा झारीय पौधा होता है। यह एशिया के अलावा यूरोप और अफ्रीका में भी पाया जाता है। हिमालयी क्षेत्र और प्राद्वीपीय भारत में आंवला के पौधे बहुतायत मिलते हैं। इसके फूल घंटे की तरह होते हैं।वाराणसी का आँवला सब से अच्छा माना जाता है। यह वृक्ष कार्तिक में फलता है। 

लाभ

आँवला दाह, खाँसी, श्वास रोग, कब्ज, पाण्डु, रक्तपित्त, अरुचि, त्रिदोष, दमा, क्षय, छाती के रोग, हृदय रोग, मूत्र विकार आदि अनेक रोगों को नष्ट करने की शक्ति रखता है। वीर्य को पुष्ट करके पौरुष बढ़ाता है, चर्बी घटाकर मोटापा दूर करता है। सिर के केशों को काले, लम्बे व घने रखता है। दाँत-मसूड़ों की खराबी दूर होना, कब्ज, रक्त विकार, चर्म रोग, पाचन शक्ति में खराबी, नेत्र ज्योति बढ़ना, बाल मजबूत होना, सिर दर्द दूर होना, चक्कर, नकसीर, रक्ताल्पता, बल-वीर्य में कमी, बेवक्त बुढ़ापे के लक्षण प्रकट होना, यकृत की कमजोरी व खराबी, स्वप्नदोष, धातु विकार, हृदय विकार, फेफड़ों की खराबी, श्वास रोग, क्षय, दौर्बल्य, पेट कृमि, उदर विकार, मूत्र विकार आदि अनेक व्याधियों के घटाटोप को दूर करने के लिए आँवला बहुत उपयोगी है

महुआ (वानस्पतिक नाम : Madhuca longifolia/mahua लोंगफोलिआ)

 एक भारतीय उष्णकटिबन्धीय वृक्ष है जो उत्तर भारत के मैदानी इलाकों और जंगलों में बड़े पैमाने पर पाया जाता है। यह एक तेजी से बढ़ने वाला वृक्ष है जो लगभग 25 मीटर की ऊँचाई तक बढ़ सकता है। इसके पत्ते आमतौर पर वर्ष भर हरे रहते हैं। यह पादपों के सपोटेसी परिवार से सम्बन्ध रखता है। यह शुष्क पर्यावरण के अनुकूल ढल गया है, यह मध्य भारत के उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन का एक प्रमुख पेड़ है।

महुआ के हर हिस्से में विभिन्न पोषक तत्व मौजूद हैं। गर्म क्षेत्रों में इसकी खेती इसके स्निग्ध (तैलीय) बीजों, फूलों और लकड़ी के लिये की जाती है। कच्चे फलों की सब्जी भी बनती है। पके हुए फलों का गूदा खाने में मीठा होता है। प्रति वृक्ष उसकी आयु के अनुसार सालाना 20 से 200 किलो के बीच बीजों का उत्पादन कर सकते हैं। इसके तेल का प्रयोग (जो सामान्य तापमान पर जम जाता है) त्वचा की देखभाल, साबुन या डिटर्जेंट का निर्माण करने के लिए और वनस्पति मक्खन के रूप में किया जाता है। ईंधन तेल के रूप में भी इसका प्रयोग किया जाता है। तेल निकलने के बाद बचे इसके खल का प्रयोग जानवरों के खाने और उर्वरक के रूप में किया जाता है। इसके सूखे फूलों का प्रयोग मेवे के रूप में किया जा सकता है। इसके फूलों का उपयोग भारत के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में शराब के उत्पादन के लिए भी किया जाता है। कई भागों में पेड़ को उसके औषधीय गुणों के लिए उपयोग किया जाता है, इसकी छाल को औषधीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग किया जाता है। कई आदिवासी समुदायों में इसकी उपयोगिता की वजह से इसे पवित्र माना जाता है।

महुआ की शराबसंपादित करें

महुआ के सूखे फूल

महुआ के फूलों से शराब बनायी जाती है। इसे संस्कृत में 'माध्वी' और ग्रामीण क्षेत्रों में आजकल 'ठर्रा' कहते हैं। महुआ का शराब भारत के अनेक आदिवासी क्षेत्रों में बहुत लोकप्रिय पेय है। उदाहरण के लिए मध्य प्रदेश के झाबुआ की महुआ की शराब काफी प्रसिद्ध है। यह शराब पूरी तरह से रसायन (केमिकल) से मुक्त होती है। इसी तरह, छत्तीसगढ़ के बहुत से भागों में भी महुआ शराब बनाया जाता है जिनमें बिरेझर (राजनांदगांव) और टेमरी (दुर्ग) में प्रमुख हैं।

महुआ का फूल जब पेड़ से पूरी तरह से पक कर गिरता है, उसके बाद इस फूल को पूरी तरह से सुखाया जाता है। इसके बाद सभी फूलों को बर्तन में पानी में मिलाकर तथा इसमें अवश्यकतनुसार विभिन्न प्रकार के पेड़ों के छाल, फूल, पत्ते आदि मिलाकर ५-६ दिन तक रखा जाता है। उसके बाद उस बर्तन को आग पर गरम किया जाता है और गरम होने पर जो भाप निकलती है उसको नली के द्वारा दूसरे बर्तन मैं एकत्रित किया जाता है। भाप ठंडी होने पर महुआ की शराब होती है।

अन्य उपयोगसंपादित करें

  • महुए का फूल, फल, बीज, छाल, पत्तियाँ सभी का आयुर्वेद में अनेक प्रकार से उपयोग किया जाता है।
  • महुए का धार्मिक महत्व भी है। रेवती नक्षत्र का आराध्य वृक्ष है।
  • महुए के बीज से तेल निकालने के बाद वह खली के रूप में पशुओं को खिलायी जाती है।
  • महुए का तेल
  • महुए के ताजे और सूखे फल से 'महुअरी' (महुए की रोटी) बनायी जाती है जो अत्यन्त स्वादिष्ट होती है।
  • महुए का फल पकने के बाद उसे खाया जाता है। कच्चे फल में से की तरकारी बनायी जाती है।
  • बायोडीजल या एथेनॉल के लिए
  • महुआ से जैम बनाया जा सकता है।
  • हस्त पवित्रीकरण (हैण्ड सेनेटाइजर) के रूप में 

बबूल या कीकर (वानस्पतिक नाम : आकास्या नीलोतिका
अकैसिया प्रजाति का एक वृक्ष है। यह अफ्रीका महाद्वीप एवं भारतीय उपमहाद्वीप का मूल वृक्ष है।
पुरानी मान्यताओं के अनुसार इस पेड़ में भगवान विष्णु का निवास माना जाता है।प्राचीन समय में इस पेड की पुजा की जाती थी । इस पेड़ को काटना महापाप माना जाता है। जिस जगह यह पेड होता है वह जगह अत्यंत शुभ मानी जाती है। ऐसा माना जाता है कि जिस घर में यह पेड़ पाया जाता है कि वह घर हमेशा धन धान्य से परिपूर्ण रहता है। यह पेड़ एक मात्र पश्चिमी राजस्थान में पाया जाता है 
बबूल का गोद उतम कोटि का होता है जो औषधीय गुणों से भरपूर होता है तथा सेकडो रोगों के उपचार में काम आता है ।बबूल की दातुन दांतों को स्वच्छ और स्वस्थ रखती है। बबूल की लकड़ी का कोयला भी अच्छा होता है। हमारे यहां दो तरह के बबूल अधिकतर पाए और उगाये जाते हैं। एक देशी बबूल जो देर से होता है और दूसरा मासकीट नामक बबूल. बबूल लगा कर पानी के कटाव को रोका जा सकता है। जब रेगिस्तान अच्छी भूमि की ओर फैलने लगता है, तब बबूल के जगंल लगा कर रेगिस्तान के इस आक्रमण को रोका जा सकता है। 
The species is also used for medicinal purposes. Bark of A. nilotica has been used for treating haemorrhages, colds, diarrhoea tuberculosis and leprosy while the roots have been used as an aphrodisiac and the flowers for treating syphilis lesions (New 1984).

नीलगिरी (यूकलिप्टस)


मर्टल परिवार, मर्टसिया प्रजाति के पुष्पित पेड़ों (और कुछ झाडि़यां) की एक भिन्न प्रजाति है। इस प्रजाति के सदस्य ऑस्ट्रेलिया के फूलदार वृक्षों में प्रमुख हैं
गर्मी के दिनों में ऑस्ट्रेलियाई भूभाग पर नीलगिरी के तेल वाष्पीकृत होकर झाड़ी से ऊपर उठकर विचित्र किस्म की नीली धुंध की रचना करते है। नीलगिरी तेल अत्यंत ज्वलनशील होते हैं (ये वृक्ष विस्फोट के लिए जाने जाते हैं
इसमें अत्यधिक मात्रा में रेशे होने के कारण नीलगिरी को दुनिया भर में सबसे उत्तम किस्म का लुगदी देनेवाली प्राजति माना जाता है। 
नीलगिरी का तेल पत्तों से आसानी से पिघल कर टपक जाता हैं और इनका उपयोग सफाई, दुर्गंधनाशक और बहुत ही कम मात्रा में खाद्य पूरक, खासतौर पर मिठाईखांसी की दवा और विसंकुलक के रूप में किया जा सकता है इसमें कीट प्रतिकारक गुण भी होते हैं (जान 1991 ए, बी; 1992) और वाणिज्यिक तौर पर कुछ मच्छर प्रतिकारकों में सक्रिय संघटक होते हैं।
अल्बिजिया lebbeck (सिरीस)
एक है प्रजातियों का अल्बिजिया , के मूल निवासी Indomalaya , न्यू गिनी और उत्तरी ऑस्ट्रेलिया और व्यापक रूप से खेती और देशीयकृत अन्य में उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों। इसके लिए अंग्रेजी नाम शामिल lebbeck , lebbek पेड़ , पिस्सू पेड़ , frywood , Koko और स्त्री की जीभ पेड़ । बाद का नाम ध्वनि पर एक नाटक है जो बीज बनाते हैं जैसे वे फली के अंदर खड़खड़ करते हैं। सबसे व्यापक और आम प्रजातियों में से एक होने के नाते दुनिया भर में अल्बिज़िया , इसे अक्सर सिरीस कहा जाता है
कुछ देसी शाकाहारी लोग लेबबेक को खाद्य संसाधन के रूप में उपयोग करने के लिए उत्तरदायी हैं। 
लेबेबेक एक कसैला है , जिसका उपयोग कुछ संस्कृतियों द्वारा भी फोड़े, खांसी के इलाज के लिए किया जाता है, आंख , फ्लू , मसूड़े की सूजन , फेफड़ों की समस्याओं, पेक्टोरल समस्याओं का इलाज करने के लिए एक टॉनिक के रूप में उपयोग किया जाता है, और पेट के मरोड़ का इलाज करने के लिए उपयोग किया जाता है ।  सूजन का इलाज करने के लिए छाल का उपयोग औषधीय रूप से किया जाता है । एल्बिजिया लेबबेक भी साइकोएक्टिव है

शीशम (Shisham या Dalbergia sissoo) डलबर्जिया सिस्सू

शीशम (Shisham या Dalbergia sissoo) भारतीय उपमहाद्वीप का वृक्ष है। इसकी लकड़ी फर्नीचर एवं इमारती लकड़ी के लिये बहुत उपयुक्त होती है।

सागौन या टीकवुड 
द्विबीजपत्री पौधा है। यह चिरहरित यानि वर्ष भर हरा-भरा रहने वाला पौधा है। सागौन का वृक्ष प्रायः 80 से 100 फुट लम्बा होता है। इसका वृक्ष काष्ठीय होता है। इसकी लकड़ी हल्की, मजबूत और काफी समय तक चलनेवाली होती है। इसके पत्ते काफी बड़े होते हैं। फूल उभयलिंगी और सम्पूर्ण होते हैं। सागौन का वानस्पतिक नाम टेक्टोना ग्रैंडिस (Tectona grandis) यह बहुमूल्य इमारती लकड़ी है।

पीपल (अंग्रेज़ीसैकरेडफिगसंस्कृत:अश्वत्थ)
 भारतनेपालश्री लंकाचीन और इंडोनेशिया में पाया जाने वाला बरगद, या गूलर की जाति का एक विशालकाय वृक्ष है जिसे भारतीय संस्कृति में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है तथा अनेक पर्वों पर इसकी पूजा की जाती है। बरगद और गूलर वृक्ष की भाँति इसके पुष्प भी गुप्त रहते हैं अतः इसे 'गुह्यपुष्पक' भी कहा जाता है। अन्य क्षीरी (दूध वाले) वृक्षों कीतरह पीपल भी दीर्घायु होता है।
पीपल की लकड़ी ईंधन के काम आती है किंतु यह किसी इमारती काम या फर्नीचर के लिए अनुकूल नहीं होती। स्वास्थ्य के लिए पीपल को अति उपयोगी माना गया है। पीलियारतौंधीमलेरियाखाँसी और दमा तथा सर्दी और सर दर्द में पीपल की टहनी, लकड़ी, पत्तियों, कोपलों और सीकों का प्रयोग का उल्लेख मिलता है।

पवित्रता की दृष्टि से यज्ञ में उपयोग की जाने वाली समिधाएं भी आम या पीपल की ही होती हैं। यज्ञ में अग्नि स्थापना के लिए ऋषिगण पीपल के काष्ठ और शमी की लकड़ी की रगड़ से अग्नि प्रज्वलित किया करते थे। ग्रामीण संस्कृति में आज भी लोग पीपल की नयी कोपलों में निहित जीवनदायी गुणों का सेवन कर उम्र के अंतिम पडाव में भी सेहतमंद बने रहते हैं।

बरगद फ़िकस बेंघालेंसिस(Ficus benghalensis)

बहुवर्षीय विशाल वृक्ष है। इसे 'वट' और 'बड़' भी कहते हैं। यह एक स्थलीय द्विबीजपत्री एंव सपुष्पक वृक्ष है। इसका तना सीधा एंव कठोर होता है। इसकी शाखाओं से जड़े निकलकर हवा में लटकती हैं तथा बढ़ते हुए धरती के भीतर घुस जाती हैं एंव स्तंभ बन जाती हैं। इन जड़ों को बरोह या प्राप जड़ कहते हैं। इसका फल छोटा गोलाकार एंव लाल रंग का होता है। इसके अन्दर बीज पाया जाता है। इसका बीज बहुत छोटा होता है किन्तु इसका पेड़ बहुत विशाल होता है। इसकी पत्ती चौड़ी, एंव लगभग अण्डाकार होती है। इसकी पत्ती, शाखाओं एंव कलिकाओं को तोड़ने से दूध जैसा रस निकलता है जिसे लेटेक्स अम्ल कहा जाता है।

वट वृक्ष या बरगद के औषधीय प्रयोग

वट वृक्ष हमारे धर्म में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखता है . यह पर्यावरण की दृष्टी से भी महत्वपूर्ण है . इसकी जड़ें मिटटी को पकड़ के रखती है और पत्तियाँ हवा को शुद्ध करती है .यह कफ पित्त नाशक ,रक्त शोधक ,गर्भाशय शोधक और शोथहर है.

- इसके पत्तों और जटाओं को पीसकर लेप लगाना त्वचा के लिए लाभकारी है .
- इसके दूध की कुछ बुँदे सरसों के तेल में मिलाकर कान में डालने से कान की फुंसी नष्ट हो जाती है .
- इसके पत्तों की राख को अलसी के तेल में मिला कर लगाने से सर के बाल उग आते है .
- इसके कोमल पत्तों को तेल में पकाकर लगाने से सभी केश के विकार दूर होते है .
- दांत के दर्द में इसका दूध लगाने से दर्द दूर हो जाता है और दुर्गन्ध दूर हो कर दांत ठीक हो जाता है और कीड़े नष्ट हो जाते है .यदि दांत निकालना हो तो इसका दूध लगाकर आसानी से दांत निकाला जा सकता है .
- बड़ की जटा और छाल का चूर्ण दन्त मंजन में इस्तेमाल किया जा सकता है .
- इसके दूध की २-२ बूँद आँख में डालने से आँख का जाला कटता है .
- पत्तों पर घी लगा कर बाँधने से सुजन दूर हो जाती है .
- जले हुए स्थान पर इसके कोमल पत्तों को पीसकर दही में मिलाकर लगाने से शान्ति प्राप्त होती है .
- बड का दूध लगाने से यदि गाँठ पकने वाली नहीं है तो बैठ जाती है और यदि फूटने वाली है तो शीघ्र पक कर फूट जाती है . यही दूध लगाते रहने से गाँठ का घाव भी भर जाता है .
- अधिक देर पानी में रहने से त्वचा पर होने वाले घाव बड के दूध से ठीक हो जाते है .
- फोड़े फुंसियों पर पत्तों को गरम कर बाँधने से शीघ्र ही पक कर फूट जाते है .
- यदि घाव ऐसा हो जिसमे टाँके लगाने की ज़रुरत हो तो घाव का मुख मिलाकर बड के पत्ते को गरम कर घाव के ऊपर रख कर कस के पट्टी बाँध दे .३ दिन में घाव भर जाएगा .३ दिन तक पट्टी खोले नहीं .
- इसके पत्तों की भस्म में मोम और घी मिला कर मरहम बनता है जो घावो में लगाने से शीघ्र लाभ होता है .
- इसकी छाल को छाया में सुखाकर , इसके चूर्ण का सेवन मिश्री और गाय के दूध के साथ करने से स्मरण शक्ति बढती है .
- इसके फल बलवर्धक होते है .
- पुष्य नक्षत्र और शुक्ल पक्ष में लाये हुए कोमल पत्तों का चूर्ण का सेवन प्रातः सेवन करने से स्त्री अवश्य गर्भ धारण करती है .
- इसकी छाल और जटा के चूर्ण का काढा मधुमेह में लाभ देता है .
- इसके दूध को नाभि में लगाने से अतिसार ( डायरिया ) में लाभ होता है .
- छाल के काढ़े में गाय का घी और खांड मिला कर पीने से बादी बवासीर में लाभ होगा .
- जटा का चूर्ण लस्सी के साथ पीने से नकसीर में लाभ होता है .
- इसके दूध का लेप गंडमाल पर किया जाता है .
- इसके और कई प्रयोग है जो अन्य गंभीर रोगों में लाभ देते है पर कुशल वैद्य की देखरेख में, उनकी सलाह से करने चाहिए 





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निबंध- महिला सशक्तिकरण अथवा नारी शक्ति को बल कैसे दें?                  नारी सशक्तिकरण से तात्पर्य 'महिलाएं अपने जीवन के निर्णय स्वयं लेने लगे' क्योंकि महिलाएं समाज के निर्माण का आधार होती है। पितृसत्तात्मक रूपी समाज उनके वंचन का जिम्मेदार है ऐसे में उन्हें सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक, राजनीतिक मजबूती प्रदान करने की आवश्यकता है।                        सिंधु सभ्यता से समाज मातृसत्तात्मक था परंतु उसके बाद विदेशियों के आगमन के पश्चात भारतीय समाज कमजोर होने लगा। सत्ता पर पितृसत्ता /विदेशी शक्तियाँ हावी होने लगी। तत्पश्चात महिलाओं का स्तर समाज में गिरता गया।                   उन्हें शिक्षा से वंचित रखा गया जिससे रूढ़िवादी परंपराओं,और मान्यताओं में बांधने में आसानी हुई। पर्दा प्रथा, सती प्रथा, बाल विवाह जैसी अनेक कुरीतियों मे फंसती चली गयी। इसके अलावा राजघराने में जन्मी दहेज प्रथा एक सामाजिक मुद्दा बन गया है। अतः लड़की का जन्म होना बोझ सा होने लगा...

डॉ. भीमराव अंबेडकर केवल जाति सुधारक थे या समाज सुधारक भी?

  कोई भी व्यक्ति अपने आसपास के वातावरण में होने वाली गतिविधियों से सीखता है तथा जीवन के अनुभव को ग्रहण करता है और उन्ही अनुभव को कायदे कानून मानते हुए जीवन के रास्ते में ऊंचाइयों तक बढ़ता है। ऊंचाइयों तक पहुंचने वाले व्यक्ति महान व्यक्तित्व के रूप में उभरकर सामने आते हैं। उन्हीं महान व्यक्तित्व में से एक शानदार व्यक्ति है डॉक्टर भीमराव बाबासाहेब रामजी आंबेडकर  परंतु    वर्तमान में इन्हें जाति विशेष का नेता मान लिया गया जबकि उससे कहीं ज्यादा उन्होंने  भारतीय महिलाओं की स्थिति सुधारने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई क्योंकि जातिवाद से कहीं ज्यादा महिलाओं की स्थिति दयनीय थी।   जबकि दूसरे नंबर पर जातिवाद की समस्याए है।आज भी अधिकतर महिलाएं अपने अधिकारों को नहीं जानती है इसलिए अंबेडकर जी के महत्वाकांक्षा को समझने में असमर्थ है। उन्होंने केवल जाति विशेष को दर्जा नहीं दिलाया बल्कि समाज के उन सभी वंचित वर्गों को अधिकार दिलाया जो उसके हकदार थे परंतु जिस  हर्षोल्लास के साथ अंबेडकर जयंती निम्न जाति के लोगों द्वारा मनाया जाता है उतनी जश्न के साथ  उच्च जाति तथ...