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घूँघट परम्परा : सम्मान या अपमान

घूँघट परम्परा : सम्मान या अपमान    

यह प्रथा केवल उत्तर भारत में ही क्यों दक्षिण भारत में क्यों नहीं?


 सभी को गर्मी के मौसम मे इतना गर्मी लगती है कि हर कोई ढीले -ढाले कपड़े पहनना पसंद करता है तो वही नई नवेली दुल्हन को एक हाथ का घूँघट करके रखना पड़ता है क्योंकि इससे बड़े बुजुर्गों का सम्मान होता है ऐसा लोगो का मानना है।


           घूँघट परम्परा की बात करे तो 500 ई.पू.  से 9वी ईस्वी तक कहीं भी इसका जिक्र नहीं है अर्थात वेद, पुराण में इसका कहीं भी वर्णन नहीं किया गया है। सीता तथा कुंती ने भी घूंघट नहीं डाला तो आखिर घूंघट परंपरा का प्रचलन समाज में आज क्यों बना हुआ है और यह प्रथा केवल उत्तर भारत में ही क्यों दक्षिण भारत में क्यों नहीं?


      इसका कारण जानने के लिए आइए हम इतिहास के पन्नों पर नज़र डालते हैं। मध्यकालीन भारत के इतिहास के  कुछ पहलूओ से पता चलता है कि 10 वीं शताब्दी से 16 वीं शताब्दी के बीच मुस्लिम शासकों का भारत में आगमन हुआ।
वे लोग ईरान अफगानिस्तान से होते हुए भारत के उत्तरी भागों में फैले कहीं लूटपाट करने लगे तो कहीं शासन करने लगे। उनकी नजरें भारत के महिलाओं के प्रति गंदी थी और उन महिलाओं से जोर जबरदस्ती करते बलात्कार करने लगे, इसलिए उनके गंदी नज़रो से बचने के लिए  भारतीयों द्वारा  पर्दा प्रथा अपनाया गया था जो धीरे-धीरे प्रचलन में आ गया और अब इसे हम अपनी भारतीय परम्परा मानते है। हमारे बुजुर्ग जो परंपरा बनाते हैं, वह गलत नहीं होता लेकिन वह परंपरा समय के अनुसार गलत हो जाता है।


                         

          मुस्लिम समुदाय में यह पर्दा प्रथा के रूप में जाना जाता है तो वहीं हिंदू समुदाय में घूंघट के रूप में।आज के समय में पढ़े लिखे हैं, लोग शिक्षित हैं, समझदार हैं। शहरों में यह परंपरा ना के बराबर देखी जाती है परंतु गांव में यह परंपरा आज भी बरकरार है और उनका मानना है कि घूँघट या सिर पर पल्लू डालने से बड़े बुजुर्गों का सम्मान होता है परंतु इस परंपरा का मुख्य उद्देश्य था कि लोगों के गंदी नजरों से बचना अर्थात ऐसा कहा जा सकता है कि बड़े बुजुर्गों का अपने बहूओं के प्रति गंदी नजर है जिससे बचने के लिए घूँघट किया जाता है तो इससे बड़े बुजुर्गों का सम्मान हुआ ही कैसे? यह तो सीधे-सीधे उनका अपमान ही हो रहा है।


             दक्षिण भारत की तरफ नजर दौड़ायी जाए तो वहां घूंघट परंपरा देखने को नहीं मिलती क्योंकि न तो वहां मुस्लिम शासकों का आगमन हुआ और नहीं यह परंपरा विकसित हुई। वहां की महिलाएं घूंघट नहीं करती।
आज भारत को स्वतंत्र हुए 60 से 70 दशक हो गए। भारत का खुद का संविधान है जिसमें मौलिक अधिकार अनुच्छेद 14 से अनुच्छेद 35 है। हर व्यक्ति को स्वतंत्र जीने खाने रहने का अधिकार है जिसको कोई छीन नहीं सकता। परंपरा के आड़ में महिलाओं की स्वतंत्रता को दबाया जा रहा है जो महिला सशक्तिकरण को बाधित करता है।
   घूंघट एक ऐसी रूढ़िवादी परंपरा है जिससे महिलाओं का खुद का पहचान छुप जाता है। वह लोगों में अपने नाम से नहीं बल्कि पति के नाम से जानी जाती है। इस परंपरा को मिटाने के लिए लोगों को जागरूक किया जाना ज्यादा जरूरी है। किसी भी गलत मुद्दे पर जागरूकता की सबसे बड़ी नींव है शिक्षित समाज का होना ताकि वे रूढ़िवादी परंपराओ मे ना उलझे।
        अगर देखा जाए तो मूवी का सामाजिक सोच के परिवर्तन में गहरा असर पड़ता है। लापता लेडीज ऐसी ही एक मूवी है जो घूंघट प्रथा से पनपे समस्याओं को उजागर करते हुए दिखाया गया है।





टिप्पणियाँ

Unknown ने कहा…
You are great dii 😊😊😊😊
बेनामी ने कहा…
Very nice 🙏

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